E-इश्क: मुझे अपने जीवन से कोई शिकायत नहीं, तुम्हारी बात का जवाब दे कर मैं अपने आज को नष्ट नहीं करना चाहती

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4 दिन पहले

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बात आज की नहीं है, बात कल की भी नहीं, बात परसों या बरसों की भी नहीं। ये उन दिनों की बात है जब अक्सर दीदियों की शादी में गाना बजा करता था, “दीदी तेरा देवर दीवाना।’’ दीदियों के देवर का सपना हर लड़की के मन में बसता था। लेकिन दीदी का सुदर्शन देवर अनदेखा ही रह गया, क्योंकि आर्मी से उसे छुट्टी ही नहीं मिल पाई। तनुजा ने तब नया नया एम ए हिंदी में दाखिला लिया था। वसुधा दीदी के ब्याह के लिए जम कर तैयारियां की थीं उसने। उसका खुलता गेहुआं रंग और तीखे नाक नक्श, सभी की प्रशंसा पा चुके थे। फिर उसका पहनने ओढ़ने का ढंग भी अनूठा था। दीदी की ननद तो उसकी हमउम्र ही थी। मचल गई थी तनुजा के लिए कि तनुजा ही उसकी छोटी भाभी बनेगी। एक मीठा सपना तनुजा के मन में भी जन्म लेने लगा था। फिर दीदी की उसी ननद की शादी में तनुजा को स्टेशन रिसीव करने दीदी का देवर आया था। विवेक रास्ते भर कुछ नहीं बोला। तनुजा जैसे ही घर पहुंची, वसुधा दीदी दौड़ कर बाहर आईं, “विवेक, तनु को पहचान लिया था न ? मैंने तेरी फोटो दिखाई थी विवेक को।’’ “भाभी, ये है आपकी बहन जिसकी इतनी तारीफ करी थी आपने? ये तो कुछ ख़ास नहीं। टिपिकल हिन्दुस्तानी सामान्य लड़की। मैं तो अप्सरा की उम्मीद में था।’’ इतनी देर बाद मुंह से बोल फूटा तो ऐसा। तनुजा चिढ़ गई, ‘’ मैं जैसी हूं वैसी हूं। आप मुझे सर्टिफिकेट न ही दें तो सही रहेगा प्लीज़।’’ “तनु, विवेक ऐसा ही है, इसकी बातों का बुरा मत मानना।’’ तनुजा ने कमरे में आ कर खुद को आईने में देखा। कुछ कुछ गेरुए रंग की साड़ी, मैचिंग ब्लाउज। घने बालों की लम्बी चोटी, बाईं कलाई पर घड़ी। सादे लिबास में भी सुन्दर लग रही थी वो। फिर विवेक ने ऐसा क्यों कहा ? लेकिन ये नोंक झोंक यहीं समाप्त नहीं हुई। कुछ खिंचाव तो दोनों तरफ से था। तनुजा को विवेक अच्छा लगने लगा था और शायद विवेक का भी यही हाल था। बहुत सी बातें धीरे-धीरे दो दिलों को पास ले आती हैं। अनजाने में ही विवेक और तनुजा पास आते जा रहे थे। उस दिन तनुजा छत पर अपने लम्बे, घने बाल सुखा रही थी कि विवेक आ गया। “ये बाल क्यों बिखेरे रहती हो तुम ? जूडा बांधा करो। लेफ्टिनेंट साहब को ऐसा पसंद नहीं। टिंच हो कर रहा करो।’’ “उंह, मुझे क्या करना लेफ्टिनेंट साहब की पसंद नापसंद से,’’ तनुजा ने मुंह बनाया। विवेक ने उसके बिखरे बालों को खींचा। प्यार से, तकरार से। “छोड़ो भी, ब्रूट कहीं के। सारे बाल टूट गए। एकेडमी में ऐसी ट्रेनिंग दी जाती है क्या?’’ तनुजा दनदनाती हुई छत से नीचे आ गई। बारात वाले दिन तनुजा साड़ी पहनती है। नीले बॉर्डर वाली गुलाबी सिल्क की साड़ी। मोती का सेट, लम्बे बाल यूं ही खुले। दीदी की सास सौ जान से निहाल थीं, “तनुजा अगर कॉन्वेंट की पढ़ी होती तो विवेक के लिए मांग लेती। पर हमारे विवेक को तो मॉडर्न लड़कियां पसंद हैं।’’ विवेक भी कैसा है? पल में तोला, पल में माशा। सबके बीच ऐसे दिखाता है मानो जनम का बैरी हो तनुजा का। लेकिन कभी अकेले में उसकी निहारती चोर दृष्टि को तनुजा पकड़ लेती तो इधर-उधर देखने लगता है। दीदी के कमरे तक जाती तनुजा रुक गई। “तुझे तनुजा पसंद है, विवेक ? कहूं मांजी से?” “अरे नहीं भाभी, शी इज नॉट माय टाइप। यू नो, देसी, इन्डियन, घरेलू सी है। मेरे सर्किल में फिट नहीं बैठेगी। मुझे चाहिए बहुत ही स्मार्ट सी लड़की जिसकी आंखें बोलती सी हों। गिटिर-पिटिर इंग्लिश बोलने वाली, हाई हील पहनने वाली।” एक ठहाका तनुजा के दिल पर गहरी चोट दे गया। उसने अपने आंसू मुश्किल से रोके थे। दीदी के घर से लौट आई थी वो। उदास सी, खोई सी। एम ए करते ही उसका भी ब्याह हो गया। फिर विवेक से कभी नहीं मिली। कभी विवेक का ज़िक्र भी होता तो वहां से उठ जाती। अपनी घर गृहस्थी में सुखी संतुष्ट थी तनुजा। बरस दर बरस बीते। धीरे-धीरे पन्द्रह बरस बीत गए। दीदी की सास की मातमपुरसी के लिए गई तनुजा सहसा चौंक गई। सामने बैठा विवेक कितना बदला बदला सा लगा था। कुहनी के नीचे का दायां हाथ गायब था। कहां गया वह हंसमुख, बातूनी युवा? भारतीय सेना का वो जोशीला जवान क्या मात्र अपना एक हाथ खो देने से इतना हताश, निराश हो जायेगा? दीदी ने बताया था- आर्मी की न्यूज़ कवर करने गई एक स्मार्ट सी जर्नलिस्ट से शादी की थी विवेक ने। दो साल में ही डिवोर्स हो गया। बेटी थी एक, उसे भी साथ ले गई। वही धक्का विवेक को खाली कर गया। तनुजा को याद आया, “शी इज़ नॉट माय टाइप।” जब चलने लगी तो एक बार फिर स्टेशन तक कैब में विवेक साथ था। “तनुजा, एक जवाब दोगी ? उस समय अगर मैं हां कहता तो क्या तुम मान जाती?” तनुजा की आंखें भर आईं। “बीते बरसों की बात जाने दो, विवेक। अभी मैं जहां हूं, जैसी हूं, अपने घर परिवार में सुखी संतुष्ट हूं। मुझे अपने जीवन से कोई शिकायत नहीं। तुम्हारी बात का जवाब दे कर मैं अपने आज को नष्ट नहीं करना चाहती।” “तुम्हारी एक अमानत है मेरे पास।’’ एक लिफाफे में कुछ रखा था। तनुजा ने खोल कर देखा, नीले बॉर्डर वाली गुलाबी साड़ी में लिपटी पन्द्रह साल पहले की तनुजा की तस्वीर। कैब रुक गई थी। स्टेशन आ गया था।

– आभा श्रीवास्तव

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