बच्चों की दीदी: ‘प्यार और धैर्य से सब संभव हो सकता है’

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2 दिन पहले

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हर बच्चा हर इंसान हर रूह हर चेहरा अलग है फिर क्यों किसी को अपनाने का डर और क्यों किसी पर सब लुटाने की चाह? कुछ ऐसी सोच को खत्म करने की चाह में डिप्लोमा इन स्पेशल इंटेलेक्चुअल डिसेबिलिटी ने 21 साल की दिवांशी छेतीजा को कुछ हटकर करने की राह दिखाई। वे बच्चे जिनका कुदरती तौर पर मानसिक और शारीरिक विकास ठीक से नहीं हो पाता उन्हें दुनिया या तो बेचारा की नजर से देखती है या इनके प्रति लापरवाह हो जाती है, लेकिन मैं इनके लिए कुछ करना चाहती थी सिर्फ इन्हें दया का पात्र नहीं बनाना था। ये सब्र भरे शब्द दिवांशी ने दैनिक भास्कर के साथ हुई बातचीत में कहे।

दिवांशी छेतीजा

दिवांशी छेतीजा

इतनी कम उम्र में इन विशेष जरूरतों के बच्चों को पढ़ाने का सब्र उसी बच्चे में हो सकता है जिसके भीतर बच्चों के लिए प्यार और सेवा का भाव हो। दुनिया में पॉजिटिव चेंज लाने का झंडा बुलंद किए दिवांशी कहती हैं, ‘इन खास जरूरतों के बच्चों को पढ़ाने के शुरुआती दौर बहुत चैलेंजिंग रहा। शुरुआत मे थोड़ा डर लगता था लेकिन धीरे-धीरे सब्र और प्यार से सब मुमकिन होने लगा, जब उन बच्चों से जुड़ी तब लगा कि इन्हें स्पेशल एजुकेटर्स की ज्यादा जरूरत है। दिल्ली में पली-बढ़ी दिवांशी भास्कर वुमन से बातचीत में बताती हैं, ‘मैंने आठवीं क्लास में तय कर लिया था कि मुझे इंग्लिश ऑनर्स करना है, लेकिन 2018 में जब दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिला लिया तो महसूस हुआ की यहां ज्यादा कुछ सीखने को नहीं मिल पाएगा। एक साल के अंदर ही मैंने ऑनर्स कोर्स छोड़ दिया और स्पेशल एजुकेश इंटैलेक्चुअल डिसएबिलिटी कोर्स जॉइन किया।

स्पेशल किड्स को रोजाना की जिंदगी सिखाती हैं दिवांशी

स्पेशल किड्स को रोजाना की जिंदगी सिखाती हैं दिवांशी

पॉजिटिव चेंज लाने के लिए जॉइन किया कोर्स

इस कोर्स को जॉइन करने का मेरा पर्पज यही था कि मैं किसी में पॉजिटिव चेंज ला पाऊं। दूसरा मेरी ट्यूशन टीचर ने भी इस कोर्स को पढ़ने के लिए बहुत मोटिवेट किया। बचपन से पेरेंट्स और खास दोस्तों ने जिंदगी का मतलब समझाते हुए सिर्फ इतना कहा था कि दिवांशी अपनी जिंदगी से प्यार करना है तो सबको समान नजरों से देखो, सबको प्यार करो। ये लाइन मेरे लिए बेस्ट मोटिवेटर बनी।

अलग-अलग स्कूलों में हुए अलग अनुभव

दिल्ली से ही इंटैलेक्चुअल डिसएबिलिटी का दो साल का डिप्लोमा किया। यह कोर्स थ्योरी और प्रैक्टिकल दो हिस्सों बंटा था। थ्योरी पार्ट के बाद हमें अलग-अलग स्कूलों में इन खास जरूरतों के बच्चों को पढ़ाने के लिए भेजा गया। इस कोर्स के दौरान सबसे पहली सीख मिली कि इन बच्चों को सिर्फ पढ़ाने के लिए नहीं पढ़ाना है बल्कि उनकी जिंदगी में पॉजिटिव चेंज लाने के लिए पढ़ाना है। अगर बच्चों को बेचारे की नजर से देखेंगे तो उनके लिए कुछ नहीं कर पाएंगे, उन्हें पढ़ाने के लिए उनकी जगह उनके जैसा बनकर खुद को देखना होता है। अलग स्कूलों में देखा कि किसी बच्चे का आईक्यू कम था, किसी को दिखाई नहीं देता,किसी को पता ही नहीं कि उसके एनवायरमेंट में क्या चल रहा है, जैसे बच्चे मिलते वैसी उन्हें पढ़ाने की टैक्नीक अपनाते |

हाइपर एक्टिव बच्ची के बिहेवियर में बदलाव कर महसूस किया एचीवमेंट

एक बच्ची ऐसी मिली जो हाइपर एक्टिव थी। जिस वजह से वह एक सेकेंड के लिए कहीं बैठ नहीं सकती थी। उसे अगर टीचर बैठाते थी थे तो कुर्सी से बांधकर बैठाते या उसके कंधों पर पत्थरों से भरा बैग लटकाकर। उस बच्ची को मैं जीरो से 30 सैकेंड तक बैठा पाई, ये मेरे लिए सबसे बड़ी एचीवमेंट थी। उसे मार या गुस्सा नहीं प्यार की छुअन चाहिए थी वो उसे मेरी तरफ से मिला और बिहेवियर में पॉजिटिव चेंज आया। एक बच्ची का आईक्यू कम था तो एक दीवारों की पपड़ी खाती, इन बच्चों के बिहेवियर में सकारात्मक बदलाव आते देखा। यही मेरी उपलब्धि साबित हुए।

बच्चों की जिंदगी में पॉजिटिव चेंज लाना चाहती हैं दिवांशी

बच्चों की जिंदगी में पॉजिटिव चेंज लाना चाहती हैं दिवांशी

पढ़ाया हुआ भूलते नहीं ये बच्चे

जब हम किसी ऐसे बच्चे को पढ़ाते हैं जो विशेष जरूरतों की कैटेगरी में नहीं आते तो वो एक बार का सिखाया भूल भी जाते हैं या अपने एनवायरमेंट के हिसाब से चीजें सीखते हैं, लेकिन जब स्पेशल नीड्स बच्चों को पढ़ाया तो देखा कि ये बच्चे एक बार सिखाया हुआ याद रखते हैं। वह उनके लिए एक स्किल बन जाती है। इन बच्चों को बहुत छोटी-छोटी चीजें सिखानी होती हैं। उन्हें ब्रशिंग करना, वॉशरूम जाना, खाना खाना जैसी रोजमर्रा की जिंदगी की बातें भी सिखानी पड़ती हैं। अगर हम उन्हें टाइम मैनेजमेंट के बारे में बता रहें तो उससे पहले उन्हें घड़ी क्या है, मिनट हैंड क्या है, नंबर क्या होता है, ये सब सिखाना पड़ेगा तब वे समय देखना सीखेंगे। इन बच्चों को पढ़ाते हुए जाना कि हमारी प्रॉब्लम्स तो कुछ भी नहीं हैं। अगर हमारे पास समस्याएं हैं तो उनका हल भी है, लेकिन इन बच्चों की प्रॉब्लम्स का कोई सलुशन नहीं है। इनके पेरेंट्स तक इन्हें छोड़ देते हैं। इनकी सुधबुध लेना वाला कोई नहीं होता।

इन दिनों स्लो लर्नर्स को पढ़ाती हूं

मैंने आगे सोचा है कि मेरी जो अपनी बेकरी है वहां इन बच्चों को बेकिंग सिखाऊंगी। अपने यहां रोजगार दूंगी। मेरा ये कोर्स पूरा हो गया है। इन दिनों में ब्लिंक फाऊंडेशन से जुड़ डीलर्नर्स प्लेटफॉर्म के साथ स्लो लर्नर्स बच्चों को पढ़ा रही हूं। शुरुआत में इन्हें हैंडिल करना मुश्किल होता था लेकिन महसूस किया है कि प्यार से सबकुछ कराया जा सकता है। मैं खुद भी बहुत उम्रदराज नहीं हूं। लेकिन इन बच्चों के साथ जुड़कर मैंने खुद बहुत कुछ सीखा। बहुत बार लोगों ने मुझसे पूछा कि ऐसे बच्चों को हैंडिल करके तुम्हें गुस्सा नहीं आता? तब मैंने कहा कि मुझे गुस्सा नहीं प्यार आता है। बस मन में ये आता है कि बच्चे मेरे बाल खींच रहे हैं, खीचें पर आगे किसी और के न खींचें। मुझे खुशी होती है कि मेरी वजह से किसी बच्चे के बिहेवियर में चेंज आया। मेरे पापा में बहुत धैर्य है, तो ये पेशेंस मैंने उनसे ही सीखा है। मुझे इन बच्चों पर गुस्सा नहीं आता बल्कि उन्हें सिखाने की इच्छा जागती है।

किसी की जिंदगी बदलने के लिए पढ़ाएं

आगे मैं यही कहना चाहू्ंगी कि अगर आप विशेष जरूरतों के बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं तो केवल नौकरी की वजह से न पढ़ाएं बल्कि अगर आप उस बच्चे की जिंदगी में बदलाव लाना चाहते हैं तब स्पेशल एजुकेशन बतौर नौकरी चुनें। यह फील्ड कमाई को समुद्र है, लेकिन सिर्फ अच्छा पैसा कमाने के लिए किसी बच्चे के साथ खिलवाड मत कीजिए। किसी की जिंदगी बदलने के लिए उन्हें पढ़ाएं।

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