आपकी ‌‌क्रिकेट स्टोरी भास्कर ऐप पर: ये कहानी बक्सर के इंद्र की है, पापा के डर के मारे तकिए में रेडियो भरकर मैच सुनते थे

0

  • Hindi News
  • Sports
  • Cricket
  • T20 world cup
  • This Story Is Of Indrabhushan Of Patna, He Used To Take Out The Cotton Of The Pillow And Listen To The Match By Filling The Radio In It To Save Him From His Father.

  • टी-20 वर्ल्ड कप पर दैनिक भास्कर ऐप की क्रिकेट वाली यादें सीरीज शुरू
  • अपनी कहानी [email protected] पर ईमेल से या 9899441204 पर वॉट्सऐप के जरिए भेजिए

क्रिकेट वाली यादें सीरीज की पहली कहानी बिहार के बक्सर के इंद्रभूषण की है।उनका बचपन रेडियो पर क्रिकेट कॉमेंट्री सुनते हुए बीता था। उन्होंने अपने बचपन की यादों में से कुछ बेहद मजेदार किस्से सुनाए हैं। आइए उनकी पूरी कहानी, उन्हीं की जुबानी पढ़ते हैं-

मेरा घर बिहार के बक्सर जिला के नेनुआ गांव में है। बचपन में क्रिकेट की दीवानगी ऐसी थी कि सुबह लोटा लेकर मैदान में निकलते थे तो साथ में रेडियो में क्रिकेट कॉमेंट्री भी चलती रहती थी।

कई बार लगता था कनपटी पर तमाचा रसीद होने वाला है
मेरे पापा रेडियो पर मैच सुनने की आदत से बहुत खफा रहते थे। कई बार तो कनपटी पर तमाचा रसीद होते-होते बच जाता था। एक बार टीम इंडिया न्यूजीलैंड के दौरे पर गई थी। वहां के मैच हमारे यहां के टाइम से सुबह 3 बजे शुरू हो जाते थे।

मैं सुबह-सुबह रेडियो लगा के बैठा था। पापा करीब चार बजे आए। जागता देखकर खुश हो गए, लेकिन इधर रेडियो ने कहा कि ये लगा बीएसएनएल चौका, कनेक्टिंग इंडिया। उधर पापा ने रेडियो उठाया और पटकने के लिए हाथ उठाए।

शुक्र हो मम्मी का, वो भागते आईं और उन्होंने पापा के हाथ रेडियो छीन लीं। बोलीं कि वो रेडियो छिपाकर रख देंगी और दोबारा हम तीनों भाइयों में से किसी भी को नहीं देंगी। हमें लगा कि अब तो गया, लेकिन शाम होते-होते हमने मम्मी से रेडियो मांग ही लिया। उन्होंने भी ये कसम दिलाई कि किसी हाल में पापा नहीं देखने चाहिए।

तकिए की रुई निकालने का आइडिया वेस्टइंडीज के मैच चलते आया
अब कोई तरीका नहीं सूझ रहा था क्या किया जाए। फिर एक आइडिया आया कि तकिए की सारी रु‌ई निकाल ली जाए। और उसके अंदर रेडियो को भरकर ऊपर से तकिए की खोल चढ़ा दी जाए।

किया भी यही। अब हमारा सब मस्त चलने लगा। दो-दिन चार दिन बीता, हम लोग बेफिक्र तकिए के ऊपर सिर रखकर मैच सुनने लगे, लेकिन एक दिन इसकी भी पोल खुल गई। तकरीबन सुबह 4 बजे का वक्त था, तकिए के ऊपर सिर रखकर मैच सुन रहे थे । पापा भी बगल में ही सोए थे। अचानक सिर इधर उधर होने से रेडियो की वॉल्यूम बढ़ गई और कॉमेंट्री गूंजने लगी।

जब तकिए के अंदर वाला रेडियो भी पकड़ लिया गया
अब तो पापा का गुस्सा सातवें आसमान पर था। उन्होंने सीधे तकिए को उठाया और दे पटक मारा। तकिए के साथ रेडियो भी चूर-चूर हो गया। पूरे दिन घर में बवाल कटता रहा। फिर हम लोगों ने कान पकड़कर माफी मांगी। तब जाकर मामला शांत हुआ।

घर का बवाल तो हमने माफी मांगकर शांत करा लिया लेकिन अंदर जो क्रिकेट सुनने का तूफान उठ रहा था, उसे शांत नहीं कर पा रहे थे। फिर पड़ोसी के चाचा के पास गए।

उन चाचा से हमारी ज्यादा बनती नहीं थी, लेकिन हम एकदम प्यार से जाकर बोले कि अपना रेडियो की आवाज थोड़ी तेज रखा कीजिए। जब उनके यहां रेडियो चलता तो हम लोग स्कोर पर्ची पर लिखकर और पढ़ाई के दौरान एक-दूसरे को दिखाते रहते।

ये तो थी इंद्रभूषण की कहानी। आपकी कहानी भी इसी तरह दैनिक भास्कर ऐप पर आ सकती है। ईमेल और फोन नंबर हमने ऊपर दिया है। वहीं पर लिखकर या वीडियो बनाकर हमें भेज दीजिए।

Leave a Reply