उम्मीद दिखाने वाली सर्जरी: ब्रेन डेड था मरीज, परिवार की अनुमति से डॉक्टरों ने किया सुअर की किडनी का सफल ट्रांसप्लांट

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न्यूयॉर्क3 दिन पहले

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न्यूयॉर्क में डॉक्टरों ने एक इंसान के शरीर में सुअर की किडनी (गुर्दे) का ट्रांसप्लांट करने में सफलता हासिल की है। ब्रेन डेड घोषित हो चुके मरीज के परिवार की इजाजत से किए गए इस ट्रांसप्लांट के बाद भी उसके शरीर के सभी अंग सही तरह से काम कर रहे हैं। इसे किडनी ट्रांसप्लांट के इंतजार में खड़े लाखों मरीजों के लिए बहुत बड़ी वैज्ञानिक सफलता माना जा रहा है।

यूएसए टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, यह ट्रांसप्लांट न्यूयॉर्क सिटी के N.Y.U. लैंगून ट्रांसप्लांट इंस्टीट्यूट में किया गया। ट्रांसप्लांट में इस्तेमाल किडनी जेनेटिकली इंजीनियरिंग के जरिए एक सुअर से ऐसे हासिल की गई थी कि मानव शरीर उसे खारिज नहीं कर सके।

ब्रेन डेड मरीज के शरीर में भी इस किडनी को सामान्य ट्रांसप्लांट प्रक्रिया की ही तरह लगाया गया। सितंबर में किए गए इस पूरे प्रयोग के दौरान मरीज को वेंटीलेटर के जरिये जिंदा रखा गया था।

लगाते ही शुरू कर दिया काम
यह ट्रांसप्लांट N.Y.U. लैंगून ट्रांसप्लांट इंस्टीट्यूट के निदेशक डॉ. रॉबर्ट मोंटगोमरी ने खुद किया। उन्होंने बताया कि किडनी को मरीज की खून की नसों से जोड़कर शरीर से बाहर ही रखकर तीन दिन तक निगरानी की गई।

उन्होंने बताया कि किडनी ने लगभग लगाते ही काम करना शुरू कर दिया। किडनी ने लगाए जाने पर यूरिन और क्रिएटनिन (शरीर का अपशिष्ट) तैयार करना शुरू कर दिया।

डॉ. मोंटगोमरी के मुताबिक, जिस मरीज पर यह प्रयोग किया गया, उसकी भी किडनी ने काम करना बंद कर दिया था और उसे ब्रेन डेड घोषित किया जा चुका था। उसके परिवार ने लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाने की इजाजत दे दी थी। लेकिन बाद में डॉक्टरों के आग्रह पर उन्होंने सिस्टम हटाने से पहले ट्रांसप्लांट का प्रयोग करने की इजाजत दे दी।

पहले भी होते रहे हैं “जेनोट्रांसप्लांटेशन” के प्रयोग
दो अलग-अलग नस्लों के बीच शरीर के अंगों या टिश्यू के इस्तेमाल की प्रक्रिया को “जेनोट्रांसप्लांटेशन” कहते हैं। इंसानी शरीर में जानवरों की खाल और खून के उपयोग की कोशिश मानव सभ्यता में सैकड़ों साल से चल रही है। इसके उदाहरण भी इतिहास की विभिन्न किताबों में मिले हैं। लेकिन अब तक इस दिशा में बड़ी सफलता नहीं मिली है।

  • 1960 में कुछ इंसानी मरीजों में चिम्पांजी की किडनी का ट्रांसप्लांट किया गया।
  • अधिकतर की अगले कुछ दिन में मौत हो गई, केवल एक मरीज 9 महीने जिंदा रहा।
  • 1983 में भी एक नवजात बच्ची में बैबून (बंदर की प्रजाति) के दिल का ट्रांसप्लांट किया।
  • बेबी फाये नाम वाली इस बच्ची की भी 20 दिन बाद दिल फेल होने से मौत हो गई।

अब भी मिलने बाकी हैं कई जवाब

हालांकि ऑर्गन ट्रांसप्लांट को लेकर लंबे समय से अधूरे पड़े बहुत सारे सवालों के जवाब अब भी मिलने बाकी हैं, क्योंकि इस प्रयोग में ब्रेन-डेड मरीज के शरीर में किडनी ट्रांसप्लांट के बाद 54 घंटे तक ही उसके शरीर पर होने वाले असर को नोट किया गया। इसके बावजूद एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस प्रयोग ने एक माइलस्टोन कायम कर दिया है, जो इस दिशा में सफलता की राह दिखाएगा।

इस लिहाज से अहम है यह सफलता
दुनिया में करीब एक करोड़ लोग किडनी फेल होने से जूझ रहे हैं। भारत में ही करीब 4 लाख मरीज मौजूद हैं। जबकि अमेरिका में भी 10,7000 मरीज किडनी ट्रांसप्लांट का इंतजार कर रहे हैं।

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